भास्कर एक्सप्लेनरप्याज की पैदावर नहीं घटी, फिर 80% महंगी क्यों हुआ: क्या आगे और बढ़ेंगे दाम; आखिर प्याज की इकोनॉमिक्स चलती कैसे है4:14Play video
प्याज की पैदावर नहीं घटी, फिर 80% महंगी क्यों हुआ: क्या आगे और बढ़ेंगे दाम; आखिर प्याज की इकोनॉमिक्स चलती कैसे है.
प्याज की पैदावर नहीं घटी, फिर 80% महंगी क्यों हुआ: क्या आगे और बढ़ेंगे दाम; आखिर प्याज की इकोनॉमिक्स चलती कैसे है.
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- इसका जवाब जानने के लिए देश में होने वाली प्याज की 3 फसलों को समझना होगा.
- ऐसे केंद्र की बीजेपी सरकार ने फिलहाल 2 मोर्चों पर काम शुरू कर दिया है.
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दिल्ली, चेन्नई, भोपाल, लखनऊ जैसे कई शहरों में प्याज की कीमतें 60 रुपए प्रति किलो के पार चली गई हैं। केंद्र सरकार सिचुएशन कंट्रोल करने के लिए 'कांदा एक्सप्रेस' चला रही है और बड़े शहरों में खुद प्याज बेच रही है।.
आपको लग रहा होगा कि ऐसा तो हर साल होता ही है और हर 8-10 साल में प्याज का बड़ा संकट आता ही है। कभी कीमतें आसमान छूने लगती हैं, तो कभी बहुत कम हो जाती हैं।.
2024-25 में 307.67 लाख मीट्रिक टन (LMT) प्याज की पैदावार हुई थी और इस बार ये आंकड़ा 307.37 LMT हो सकता है। जबकि प्याज की कुल घरेलू खपत करीब 200 LMT सालाना है। यानी कागजों पर प्याज की खपत से पैदावार ज्यादा है, तो फिर क्यों दाम बढ़ रहे हैं?
देश की बड़ी आबादी के खाने की थाली में प्याज हर दिन अच्छी-खासी मात्रा में रहता है। हर महीने करीब 17 LMT प्याज खाया जाता है, यानी 50 किलो प्याज की 3.4 करोड़ बोरियां। प्याज की मांग सालभर लगभग एक जैसी रहती है, लेकिन सप्लाई हर वक्त एक जैसी नहीं रहती।.
देश की 40% प्याज उगाने वाले महाराष्ट्र के किसानों का मानना है कि इस साल अप्रैल में बेमौसम बारिश हुई, जिससे पैदावार में कमी आई। साथ ही प्याज के स्टोरेज और क्वालिटी पर असर पड़ा है।.
कॉम्पिटिशन कमीशन ऑफ इंडिया ने एक स्टडी में पाया कि किसानों से 34 रुपए के भाव से खरीदी गई प्याज लोगों को 80 रुपए के भाव से बेचा जा रहा था।.
अगस्त 2024 में विपक्षी सांसदों ने प्याज के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की मांग को लेकर संसद के बाहर प्रदर्शन किया था। तब वे प्याज की माला पहने प्रदर्शन करने पहुंचे थे।.
एशिया की सबसे बड़ी प्याज मंडी 'लासलगांव कृषि उपज बाजार समिति' के डायरेक्टर जयदत्ता होलकर कहते हैं कि 'पिछले 4-5 महीनों में प्याज का भाव दोगुना हो गया है। आगे भी कुछ हफ्तों तक तेजी देखने को मिल सकती है। क्योंकि फिलहाल मंडी में प्याज की आवक कम है।'.
हालांकि प्याज विशेषज्ञ और नेशनल हॉर्टिकल्चरल रिसर्च एंड डेवलपमेंट फाउंडेशन (NHRDF) के एडिशनल डायरेक्टर रहे सतीश भोंडे के मुताबिक, सामान्य तौर पर रबी की फसल का प्याज दीपावली तक बाजार में आता है और फिर खरीफ वाला प्याज आने लगता है। लेकिन मौजूदा खरीफ सीजन में प्याज की कम खेती से लगता है कि इसके दाम में मामूली गिरावट आएगी।.
27 अगस्त को उपभोक्ता मामलों की सचिव निधि खरे ने दिल्ली में प्याज बेचने वाली सरकारी मोबाइल वैन का उद्घाटन किया।.
केंद्र सरकार ने प्राइस स्टेबिलाइजेशन फंड में इस साल 2 LMT रबी प्याज बफर स्टॉक जमा करने का लक्ष्य रखा था। सरकार इसका इस्तेमाल प्याज के दाम को कंट्रोल करने के लिए करती है, यानी जब बाजार में प्याज के दाम बढ़ते तो सरकार सस्ती प्याज सप्लाई करती।.
लेकिन सरकारी एजेंसियां नेशनल एग्रीकल्चरल को-ऑपरेटिव मार्केटिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया (NAFED), नेशनल को-ऑपरेटिव कंज्यूमर्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (NCCF) सिर्फ 1.21 LMT प्याज ही खरीद सके। यानी 40% कम।.
मीडिया रिपोर्ट्स हैं कि सरकारी बफर स्टॉक की 30% प्याज सड़ गया है या खराब हो गया है, जबकि ऐसा होने की सामान्य दर 20% है। हालांकि सरकार ने इसका खंडन किया है।.
दरअसल, प्याज की इकोनॉमिक्स जितनी जटिल है, उतनी ही कठिन इसकी पॉलिटिक्स है। बीते 5 दशकों में प्याज की कीमतों ने कई चुनावी नतीजे तय किए। 1980 के लोकसभा चुनाव को तो इंदिरा गांधी ने 'प्याज चुनाव' तक कहा था और जनता पार्टी के चौधरी चरण सिंह की सरकार गिर गई थी।.
फिर 1998 में जब दिल्ली में विधानसभा चुनाव हुए, तब प्याज 40-50 रुपए किलो बिक रहा था और बीजेपी चुनाव हार गई। 2013 में प्याज की कीमतें 100 रुपए तक पहुंची और 10 साल से सत्ता में काबिज कांग्रेस की मनमोहन सरकार अगले साल हुए लोकसभा चुनाव में हार गई। यानी किसी सरकार और पार्टियों के लिए प्याज काफी अहम है।.
2013 में प्याज की कीमतें बढ़ने पर भोपाल में विरोध प्रदर्शन करतीं बीजेपी की महिला कार्यकर्ताएं।.
पिछले साल भी सरकार ने सप्लाई बनाए रखने के लिए 86 मालगाड़ियों से 16 शहरों में 88 हजार टन प्याज भेजा था। 2024 में सिर्फ 14 मालगाड़ियों के जरिए 12 हजार टन प्याज भेजा गया था।. ये खबर भी पढ़िए.
50 दिनों में 19% महंगी क्यों हुई चीनी, क्या और बढ़ेंगे दाम; दुनिया को चीनी बेचने से खरीदने की नौबत कैसे आई.
पिछले 50 दिनों में चीनी 19% महंगी होकर 55.7 रुपए किलो पर पहुंच गई। ये कीमतें देशभर का सरकारी औसत हैं। कई शहरों की फुटकर दुकानों पर चीनी 65 से 70 रुपए किलो तक बिक रही है। अब सरकार ने 10 लाख टन चीनी विदेशों से मंगाने का फैसला किया है। पूरी खबर पढ़िए.
For now, भास्कर एक्सप्लेनरप्याज की पैदावर नहीं घटी, फिर 80% महंगी क्यों हुआ: क्या remains the part of the story worth watching, and further updates are likely as more details are confirmed.


