ग्राउंड रिपोर्टवर्चुअल ऑटिज्म से चुप हुआ बचपन: बच्चे मोबाइल में खोए, सिस्टम आंकड़े खोज रहा; दिल्ली और 6 राज्यों से पड़ताल2:43Play video

वर्चुअल ऑटिज्म से चुप हुआ बचपन: बच्चे मोबाइल में खोए, सिस्टम आंकड़े खोज रहा; दिल्ली और 6 राज्यों से पड़ताल.

WeatherNews Info Wire1 min read
ग्राउंड रिपोर्टवर्चुअल ऑटिज्म से चुप हुआ बचपन: बच्चे मोबाइल में खोए, सिस्टम आंकड़े खोज रहा; दिल्ली और 6 राज्यों से पड़ताल2:43Play video

वर्चुअल ऑटिज्म से चुप हुआ बचपन: बच्चे मोबाइल में खोए, सिस्टम आंकड़े खोज रहा; दिल्ली और 6 राज्यों से पड़ताल.

Article outline

  1. What happened
  2. The details
  3. A closer look
  4. More on the story
  5. The wider picture
  6. The bottom line

Key points

  • लॉकडाउन के बाद हर महीने 30-40 नए केस.
  • उत्तरप्रदेश: लखनऊ DEIC में हर रोज 5-10 केस.
  • नई दिल्ली48 मिनट पहलेलेखक: सृष्टि मिश्रा. कॉपी लिंक.
  • 7 राज्यों में पड़ताल, हर जगह लगभग एक जैसी तस्वीर.
  • गुजरात: गांधीनगर DEIC में 2 साल से वर्चुअल ऑटिज्म के केस बढ़े.

हमने जानने की कोशिश की कि सरकारी अस्पतालों में वर्चुअल ऑटिज्म के इलाज की क्या व्यवस्था है। पता चला, ऑटिज्म के ट्रीटमेंट के लिए बनाए गए डिस्ट्रिक्ट अर्ली इंटरवेंशन सेंटर, यानी DEIC में ही बच्चों की शुरुआती जांच, असेसमेंट और थेरेपी होती है।.

स्वास्थ्य मंत्रालय के 2025 के आंकड़ों के मुताबिक, देश में 451 DEIC हैं। इन सेंटरों में 32 हेल्थ कंडीशन की थेरेपी होती है। इसमें वर्चुअल ऑटिज्म शामिल नहीं है।.

उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र की राजधानियों में भी तस्वीर कुछ अलग नहीं है। राजस्थान में तो DEIC कागजों में मौजूद है, लेकिन जमीन पर नहीं। बिहार में DEIC दो कमरों में चल रहा है। देश की राजधानी दिल्ली के DEIC में भी थेरेपिस्ट की कमी है। सिलसिलेवार पढ़िए, राज्यों की राजधानियों से पड़ताल.

शुरुआत मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से. भोपाल के शासकीय जयप्रकाश जिला चिकित्सालय में बने DEIC में 2026 में अप्रैल से अगस्त के बीच ऑटिज्म पीड़ित 31 बच्चे आए, लेकिन सिर्फ एक केस वर्चुअल ऑटिज्म का माना गया। सेंटर में इसकी पहचान का अलग असेसमेंट टूल भी नहीं है। सवाल है कि फिर केस डायग्नोस कैसे हुआ।.

DEIC की साइकोलॉजिस्ट डॉ. नीम्रता दुबे बताती हैं, 'ओपीडी और फॉलोअप के ज्यादा मामले और कम स्टाफ की वजह से बच्चे को हफ्ते में कई बार बुलाना मुमकिन नहीं होता। इसलिए 15 दिन या एक महीने बाद फॉलोअप होता है। अगर सारा स्टाफ हो और बच्चे को समय पर सही थेरेपी मिल जाए, तो उनमें जल्दी सुधार हो सकता है।'.

सरकारी सेंटर के बाद हमने प्राइवेट डायग्नोस और थेरेपी सेंटर के काम का तरीका समझा। इसके लिए भोपाल के RAVI सेंटर पहुंचे। ये सेंटर तृप्ति मंगल चलाती हैं। वे 15 साल से ऑटिज्म पर काम कर रही हैं। उनकी बेटी भी ऑटिस्टिक है।.

तृप्ति बताती हैं, 'लॉकडाउन से पहले वर्चुअल ऑटिज्म के सालभर में 8 से 15 नए केस मिलते थे। लॉकडाउन के बाद हर महीने 30-40 केस आने लगे। कुछ मामले बेहद गंभीर भी रहे। कुछ बच्चे खुद को मारने, नोंचने या काटने के साथ दूसरों को नुकसान पहुंचाने लगे थे। एक बच्चे ने फोन छीने जाने पर थेरेपिस्ट का ही सिर फोड़ दिया।'.

इसी सेंटर पर 8 साल की मायरा मिली। जन्म के अगले दिन मां की मौत हो गई थी। बुआ ने परवरिश की। मायरा रोती, तो उसे मोबाइल दे दिया जाता। वह चुप हो जाती। दो साल की होने तक कुछ नहीं बोलती थी। 6 साल की उम्र में उसकी थेरेपी शुरू कराई गई। जिस मोबाइल ने कभी मायरा को चुप कराया था, आज उसी से दूर करना परिवार के लिए सबसे मुश्किल काम है।.

ऐसी ही कहानी सोना की है। उसकी मां बताती हैं, 'वो 2 साल तक बिल्कुल ठीक थी। हम जो शब्द सिखाते, बोलती थी। फिर उसे फोन देखना अच्छा लगने लगा। उसे कोई रोकता भी नहीं था। 2 साल 7 महीने की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते सोना ने बोलना बंद कर दिया। 3 साल की हुई, तब उसे डॉक्टर के पास ले गए। अब रोज थेरेपी के लिए सेंटर आती हैं। अभी वो फोन से सीखे हुए कुछ शब्द ही दोहराती है।.

स्वास्थ्य विभाग के रिकॉर्ड में जेके लोन अस्पताल में DEIC है। हम इसकी पड़ताल के लिए वहां पहुंचे तो पता चला कि यहां सेंटर चल ही नहीं रहा। अस्पताल प्रशासन के मुताबिक, सरकार से DEIC शुरू करने का लेटर मिला है।.

जेके लोन हॉस्पिटल देश का सबसे बड़ा सरकारी बाल चिकित्सा अस्पताल माना जाता है। यहां 900 से ज्यादा बेड हैं। राजस्थान समेत आसपास के बच्चे गंभीर बीमारी होने पर यहीं रेफर किए जाते हैं।.

रिप्रोडक्टिव एंड चाइल्ड हेल्थ की डायरेक्टर डॉ. मधु रितेश्वर बताती हैं कि राजस्थान में करीब 23 जगह DEIC को किसी न किसी रूप में फंक्शनल करने की कोशिश चल रही है। करीब 8 जगह बिल्डिंग तैयार हैं और हैंडओवर की प्रक्रिया बाकी है।.

पटना के गुरु गोविंद सिंह अस्पताल में दो कमरों में DEIC है, यानी पर्याप्त जगह और जरूरी सुविधाएं हीं नहीं हैं। सेंटर के मैनेजर डॉ. रविशंकर सिन्हा कहते हैं कि यहां 2024 से ऑक्युपेशनल थेरेपिस्ट और स्पेशल एजुकेटर की नियुक्ति नहीं हुई। हमारे पास थेरेपी के लिए सबसे जरूरी चीजें ही नहीं हैं। सेंसरी गार्डन और ऑडियोलॉजी रूम नहीं होने से थेरेपी नहीं हो पा रही है। हमने इस बारे में विभाग को बताया है।.

ये सेंटर किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) में है। मैनेजर गौरव सक्सेना के मुताबिक, यहां सात स्टाफ हैं और ज्यादातर जरूरी सेवाएं मिल रही हैं। साइकोलॉजिस्ट डॉ. अमित आर्य के मुताबिक, चाइल्ड OPD में रोजाना 70 से 80 बच्चे आते हैं। इनमें करीब 20 बच्चों में ऑटिज्म के लक्षण दिखाई देते हैं, जिनमें 5 से 10 मामलों में वर्चुअल ऑटिज्म के लक्षण होते हैं।.

KGMU में बने DEIC में बच्चों से फिजिकल एक्टिविटी कराई जाती हैं। पेरेमेंट की भी काउंसलिंग की जाती है, ताकि वे घर पर बच्चों से अभ्यास करा सकें।.

गांधीनगर के DEIC में 8 साल की बच्ची मिली। उसके पिता तुषार भारतीय हैं और मां यूक्रेन की हैं। तुषार बताते है कि बेटी 2019 में पैदा हुई थी। तब कोरोना चल रहा था। लॉकडाउन में हम बाहर नहीं जा पा रहे थे। बेटी घर पर बैठे-बैठे मोबाइल देखती थी। इससे उसमें वर्चुअल ऑटिज्म की समस्या बढ़ी।.

यहां की मैनेजर डॉ. पूजा पटेल के मुताबिक, सेंटर में सभी जरूरी स्टाफ हैं। वहीं, साइकोलॉजिस्ट शिखा शुक्ला बताती हैं कि बीते 2 साल से बहुत ज्यादा वर्चुअल ऑटिज्म के पेशेंट आए हैं। हमने पेरेंट्स को साइको-एजुकेट किया है कि अगर हम अर्ली इंटरवेंशन स्टार्ट कर दें, तो बच्चे के बिहेवियर में काफी हद तक सुधार हो सकता है।.

GMERS मेडिकल कॉलेज एंड जनरल (सिविल) हॉस्पिटल में बने DEIC में 50 से 100 बच्चों के रोज सेशन कराने की व्यवस्था है।.

For now, ग्राउंड रिपोर्टवर्चुअल ऑटिज्म से चुप हुआ बचपन: बच्चे मोबाइल में खोए, सिस्टम remains the part of the story worth watching, and further updates are likely as more details are confirmed.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *