नेपाल से भास्करन चट्टान-न पानी, टनल में दलदल ने रोका रास्ता: ड्रम काटकर बोट बनाई, 90 मीटर अंदर पहुंचे, कमर तक धंसे रेस्क्यू करने वाले2:12Play video
न चट्टान-न पानी, टनल में दलदल ने रोका रास्ता: ड्रम काटकर बोट बनाई, 90 मीटर अंदर पहुंचे, कमर तक धंसे रेस्क्यू करने वाले.
न चट्टान-न पानी, टनल में दलदल ने रोका रास्ता: ड्रम काटकर बोट बनाई, 90 मीटर अंदर पहुंचे, कमर तक धंसे रेस्क्यू करने वाले.
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Key points
- '40-50 मीटर का हिस्सा सबसे मुश्किल, उसे खोलना जरूरी'.
- 1. सायरन बजा, बचने के लिए मिले सिर्फ 30 मिनट.
- काठमांडू49 मिनट पहलेलेखक: आशीष राय. कॉपी लिंक.
'मैं टनल में रेस्क्यू के लिए घुसा, तो दलदल में धंसने लगा। जितना हिलता, उतना ही धंसता गया। फिर समझ आया कि यहां जमीन ही निगल रही है। मैं कमर तक धंसा था। निकलने में करीब 1 घंटे लग गए। रसुवा की इस टनल में जो देखा, ऐसा अनुभव पहले कभी नहीं हुआ।'.
ये बता रहे माउंटेन गाइड विक्रम कर्के रसुवा की टनल में चल रहे रेस्क्यू ऑपरेशन का हिस्सा हैं। वे चिलिमे, त्रिशूली-1 और त्रिशूली-3 A टनल के रेस्क्यू में शामिल हैं, जहां 100 से ज्यादा लोग फंसे हुए हैं। इन्हें निकालने के लिए नेपाल और भारतीय सेना समेत कई देशों की रेस्क्यू टीमें जुटी हैं। टनल के अंदर का हाल बताते हुए विक्रम कहते हैं, 'मशीनों के बिना यहां फंसे लोगों तक पहुंचना मुश्किल है। विक्रम ने हमें रेस्क्यू की पूरी कहानी बताई.
रेस्क्यू करने वाले लोग 90 से 100 मीटर के आगे नहीं बढ़ पा रहे। मलबे ने रास्ता ब्लॉक कर दिया है।.
विक्रम कर्के नेपाल माउंटेनियरिंग एसोसिएशन के माउंटेन रेस्क्यू कोऑर्डिनेटर हैं। वे दो बार एवरेस्ट जा चुके हैं। विक्रम बताते हैं, '26 अगस्त की सुबह करीब 10 बजे एक पुलिस अधिकारी का फोन आया। पता चला कि रसुवा में बड़ी तबाही हो गई है। खबर सुनते ही मैंने सात साथियों को इकट्ठा किया। मौसम खराब था इसलिए हम एक दिन काठमांडू में ही फंसे रहे। दूसरे दिन मोटरसाइकिल से रसुवा पहुंचे।'.
'हमने ड्रम काटकर प्लाईवुड लगाया। फ्लोट करने वाला सामान लगाया। फिर उस पर लेटकर आगे बढ़े। ऐसे करीब 90-95 मीटर तक पहुंचे, लेकिन आगे रास्ता बंद था। उसके दूसरे तरफ 6 लोग फंसे हैं, जिन्हें निकालना है। हाथ से मिट्टी हटाकर आगे जाना संभव नहीं। हमने बताया कि अब मड पंप, वाटर पंप और खुदाई की मशीन के बिना रेस्क्यू संभव नहीं है।'.
बिक्रम बताते हैं, 'हमारे साथ भारतीय सेना के 26 लोग थे। उनके कमांडिंग ऑफिसर मेहरा साहब के पास मशीनें थी। हमारे पास क्लाइंबिंग उपकरण, रस्सियां और एंकर थे। ये सब दलदल में रेस्क्यू के लिए पर्याप्त नहीं थे। हमें एक्सकेवेटर, मड पंप और ड्रिलिंग मशीन चाहिए। एक एक्सकेवेटर करीब 3 टन का है। इसे टनल तक पहुंचाने के लिए बड़ा हेलिकॉप्टर चाहिए।'.
'अगर हम 100 मीटर के बाद का टनल में 40-50 मीटर का हिस्सा और खोल दें, तो शायद दूसरी तरफ पहुंच सकें। अभी अंदर फंसे लोगों के लिए पाइप के जरिए ऑक्सीजन पहुंचाना पहली प्राथमिकता है, लेकिन उसके लिए भी रास्ता खोलना पड़ेगा।'.
विक्रम बताते हैं, 'त्रिशूली-1 यानी 216-टनल बहुत बड़ी है। हमने यहां दोनों तरफ से अंदर जाने की कोशिश की। वहां भी पानी और मिट्टी रोड़ा बने। यहां सिर्फ नेपाल और भारत की ही टीमें नहीं हैं। चीन, साउथ कोरिया और पाकिस्तान से भी टीमें आई हैं। चीन की टीम को टनल का ज्यादा अनुभव है। उनके पास बड़ी टीम और ज्यादा उपकरण भी हैं। वे टनल के काफी अंदर तक पहुंच चुके हैं।'.
'वे पावर हाउस के मुख्य हिस्से की तरफ बढ़ रहे हैं। करीब 40-50 मीटर का हिस्सा बाकी है। अगर वहां तक पहुंचे, तो दूसरे हिस्से की तरफ बढ़ेंगे। वहां लोगों के जिंदा बचे होने की उम्मीद ज्यादा है। क्योंकि टनल अंदर से इंटरकनेक्टेड हैं। यहां हवा आने-जाने का रास्ता है। यहां से 6-7 लोग बाहर भी निकले हैं। चिलिमे की स्थिति अलग है। वहां अंदर जाने और लौटने का एक ही रास्ता है। वहां ऑपरेशन सबसे मुश्किल है।'.
चिलिमे टनल में फंसे 6 कर्मचारियों के रेस्क्यू के लिए नेपाल और भारतीय सेना समेत कई जगहों की टीमें लगी हैं।.
'टिमुरे में हमने एक दिन में 78 लोगों को निकाला और 24 डेडबॉडी सेफ बेस तक पहुंचाईं। स्याप्रुबेसी में एक बॉडी निकाली, जिसका सिर नहीं था। कहीं किसी का सिर्फ पैर मिला। ये सब देखकर मजबूत इंसान भी अंदर से टूट जाता है।'.
'हम प्राइवेट सेक्टर में काम करने वाले लोग हैं। हमने इस काम के लिए एक रुपए नहीं लिया। हम 12 लोगों ने तीन-तीन की टीम में बांटकर दिन-रात काम किया। कभी एक टीम अंदर जाती और दूसरी सेफ्टी का काम संभालती। वहीं, तीसरी टीम सामान तैयार करती।'.
त्रिशूली-1 दो लोग सिर्फ मोबाइल फोन की टॉर्च के सहारे 6 साथियों को टनल से बाहर निकाल लाए। उनके पास रेस्क्यू के लिए कोई उपकरण भी नहीं था।.
'अंदर जाने के लिए ज्यादा मैनपावर चाहिए। उनमें ऐसे लोग हों, जो सेफ्टी लाइन बना सकें। लोगों को सुरक्षित तरीके से अंदर से बाहर ला सकें। सिर्फ 30-40 लोग भेजने से कुछ नहीं होगा। सरकार अपना काम कर रही है, लेकिन उसके अकेले करने से कुछ नहीं होगा। इस आपदा में पूरी दुनिया को मदद करनी होगी।'.
In short, नेपाल से भास्करन चट्टान-न पानी, टनल में दलदल ने रोका रास्ता: ड्रम is the central thread here, and readers can expect follow-up reporting as the picture becomes clearer.


